ज़ंजीर
रोज़-ओ-शब्, औकात, लम्हात
फासले दरमियाँ
हमनशीं, हमसफ़र
बेनिशान, बेसबब
क्यूंकि
सब के सब
एक तलाशे मौहूम के असीर
कैदी परिंदे हों जैसे
बेगू नह सब मगर
रुत बदलती नहीं
लम्हात, जस के तस
और रिहाई....
एक उम्मीद मौहूम सी
शायद ॥ असीरी की रुत
बदलेगी एक दिन
शायद.... कोई राहरू-ओ-राहबर
आएगा फिर नज़र
लेकिन
रुत बदलती नहीं
शाम ढलती नहीं
सूरज आता नहीं अब नज़र
क्यूंकि
सब के सब
जकड़े हुए एक ज़ंजीर में ॥
यहया इब्राहीम
रोज़-ओ-शब्, औकात, लम्हात
फासले दरमियाँ
हमनशीं, हमसफ़र
बेनिशान, बेसबब
क्यूंकि
सब के सब
एक तलाशे मौहूम के असीर
कैदी परिंदे हों जैसे
बेगू नह सब मगर
रुत बदलती नहीं
लम्हात, जस के तस
और रिहाई....
एक उम्मीद मौहूम सी
शायद ॥ असीरी की रुत
बदलेगी एक दिन
शायद.... कोई राहरू-ओ-राहबर
आएगा फिर नज़र
लेकिन
रुत बदलती नहीं
शाम ढलती नहीं
सूरज आता नहीं अब नज़र
क्यूंकि
सब के सब
जकड़े हुए एक ज़ंजीर में ॥
यहया इब्राहीम
wah ye bat to main janta hi nahi tha, ek bar aapse suna tha ki aab kawita bhi likha karte the par.....ye achhi kawita hai ...thodi rumaniyat men bhigi hui si barish ke ek zaruri jhoke ki treh man ko bhingate hue असीरी की रुत se bahr le jati hai kawita....
ReplyDeleteAap kee ye rachna bahut khubsurat.............
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